विशेषज्ञों ने न्यूरो एवं फिजिकल रिहैबिलिटेशन की उपयोगिता पर डाला प्रकाश
गलत पोश्चर व स्क्रीन टाइम से बढ़ रहीं समस्याएं
दर्द निवारण के साथ कार्यक्षमता बढ़ाने में तकनीक कारगर
अजय पाण्डेय
जौनपुर। विश्व फिजियोथेरेपी दिवस की पूर्व संध्या पर सोमवार को नगर में विशेष गोष्ठी हुई जहां स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने आधुनिक जीवनशैली में फिजियोथेरेपी की महत्ता और इसकी उपयोगिता पर विस्तृत चर्चा किया। विशेषज्ञों ने कहा कि प्रत्येक वर्ष 8 सितंबर को विश्व फिजियोथेरेपी दिवस का आयोजन इस विधा के प्रति जन-जागरूकता फैलाने और लोगों को शारीरिक रूप से सक्रिय व स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से किया जाता है।
तंत्रिका तंत्र एवं गम्भीर चोटों के उपचार में वरदान
गोष्ठी को संबोधित करते हुए डॉ. रेशू मिश्रा ने कहा कि चिकित्सा और स्वास्थ्य देखभाल दोनों ही क्षेत्रों में फिजियोथेरेपी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल दर्द से तात्कालिक राहत दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति की शारीरिक व मानसिक तंदुरुस्ती को बहाल कर उसकी कार्यक्षमता को बढ़ाने का एक सुरक्षित और प्रभावी जरिया है। उन्होंने विशेष रूप से 'न्यूरो फिजियोथेरेपी' पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) से संबंधित जटिल समस्याओं से जूझ रहे मरीजों के लिए संजीवनी के समान है। स्ट्रोक (लकवा), सिर की चोट, रीढ़ की हड्डी की चोट (स्पाइनल कॉर्ड इंजरी), मल्टीपल स्क्लेरोसिस और पार्किंसंस जैसी बीमारियों में व्यवस्थित फिजियोथेरेपी के जरिए मरीज की स्थिति में अभूतपूर्व सुधार लाया जा सकता है। इसके अलावा खिलाड़ियों में होने वाली लिगामेंट इंजरी (जैसे ACL/PCL), बुजुर्गों की शारीरिक समस्याओं और दुर्घटना के बाद होने वाली गंभीर चोटों का पुनर्वास भी इस तकनीक से सुगमता से संभव है।
बदलती जीवनशैली में बढ़ती समस्याएं एवं बचाव
विशेषज्ञों ने आज की आधुनिक और गतिहीन जीवनशैली पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लगातार घंटों बैठकर काम करना, गलत पोश्चर (बैठने व झुकने का गलत तरीका), शारीरिक गतिविधियों का अभाव और मोबाइल व कंप्यूटर स्क्रीन का अत्यधिक उपयोग कमर, गर्दन, कंधे और घुटनों से संबंधित समस्याओं को तेजी से बढ़ा रहा है। डॉ. मिश्रा ने सचेत किया कि किसी भी शारीरिक दर्द या अकड़न को लंबे समय तक नजरअंदाज करना गंभीर रूप ले सकता है। फिजियोथेरेपी का मूल ध्येय व्यक्ति की मांसपेशियों की ताकत, लचीलापन, शरीर का संतुलन और चलने-फिरने की स्वाभाविक क्षमता को पुनर्स्थापित कर उसे आत्मनिर्भर बनाना है।
समय पर परामर्श: दर्द की शुरुआत में ही योग्य फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह लें। सक्रिय दिनचर्या: नियमित व्यायाम, सही पोश्चर और दैनिक जीवन में शारीरिक गतिविधियों को शामिल करें। जागरूकता: गोष्ठी के दौरान उपस्थित मरीजों एवं नागरिकों को विभिन्न शारीरिक बीमारियों से बचाव और सही व्यायाम की तकनीकों के प्रति जागरूक भी किया गया।
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