डीडीएस में महिला सशक्तिकरण, अल्पसंख्यक अधिकारों एवं नागरिक बोध पर विद्यार्थियों के बीच हुआ सार्थक संवाद
अंकित जायसवाल
जौनपुर। नगर के सिपाह—रासमंडल में स्थित डीडीएस ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस में महिला सशक्तिकरण, अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में उन्हें पुरुषों के समान अवसर उपलब्ध कराने के विषय पर विद्यार्थियों के बीच एक सार्थक एवं विचारोत्तेजक परिचर्चा आयोजित की गई।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं निर्णायक सदस्य मोहम्मद जीशान खान उप प्रधानाचार्य ब्लासम्स पब्लिक स्कूल ने विद्यार्थियों से संवाद करते हुए कहा कि महिलाओं और युवतियों के लिए अपने अधिकारों की जानकारी होना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक पुरुषों के लिए अपनी जिम्मेदारियों तथा नागरिक बोध को समझना भी है। प्रतिभा किसी धर्म, जाति अथवा समुदाय की सीमाओं में बंधी नहीं होनी चाहिये। यदि किसी लड़की में योग्यता, प्रतिभा और आगे बढ़ने की क्षमता है तो परिवार और समाज को उसका मार्ग रोकने के बजाय उसका सहयोग करना चाहिए।
विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों एवं विचारों के आधार पर निर्णायक मंडल द्वारा परिणाम घोषित किये गये जिसमें प्रथम शिबू, द्वितीय इब्राहिम, तृतीय रहीमा, चतुर्थ नैंसी वर्मा और पंचम प्रियम रहे। विद्यार्थियों के विचार सुनने के बाद मोहम्मद जीशान खान ने कहा कि जब इस प्रकार की संगोष्ठियां प्रतियोगिता का रूप लेती हैं तो विद्यार्थियों को किसी विषय के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों को समझने का अवसर मिलता है। इससे उनमें तर्क करने, अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने, विषय को समझने तथा दूसरों के विचारों को सम्मानपूर्वक सुनने की क्षमता विकसित होती है। विद्यार्थियों को निरन्तर अध्ययन, अभ्यास, संवाद और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करते हुये कहा कि जीवन में किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरन्तर प्रयास और अभ्यास आवश्यक है।
कार्यक्रम के समापन पर संस्था की संचालिका आरती सिंह ने सभी विद्यार्थियों को कार्यक्रम में सहभागिता के लिए धन्यवाद एवं शुभकामना दिया। साथ ही मुख्य अतिथि एवं निर्णायक सदस्य मोहम्मद जीशान खान के प्रति आभार भी जताया। आरती जी ने कहा कि महिलाओं एवं अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों की बात करने के साथ समाज के प्रत्येक व्यक्ति में नागरिक बोध, सामाजिक जिम्मेदारी और पारस्परिक सम्मान की भावना विकसित करना आवश्यक है। जब किसी भी जाति, धर्म अथवा समुदाय के लोगों में एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करने और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाने की भावना विकसित होगी तभी वास्तविक समानता स्थापित हो सकेगी। इस अवसर पर तमाम लोग उपस्थित रहे।
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