सुशील स्वामी
जौनपुर। जिले में पिछले कुछ वर्षों में यूट्यूब चैनलों और स्वयंभू पत्रकारों की संख्या में अचानक बढ़ोतरी हुई है। इसका सीधा असर जमीनी स्तर पर काम कर रहे पेशेवर पत्रकारों पर पड़ रहा है। बिना मान्यता, बिना प्रशिक्षण और अक्सर बिना जवाबदेही के चल रहे ये चैनल न केवल गलत सूचना फैला रहे हैं, बल्कि प्रशासन और आम जनता के बीच पत्रकारिता की साख को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं।
माइक एवं कैमरा बना पहचान का जरिया
स्मार्टफोन और इंटरनेट की सुलभता ने किसी को भी "पत्रकार" बनने का मंच दे दिया है। जौनपुर के तहसील परिसर से लेकर थानों और ब्लॉक कार्यालयों तक ऐसे लोग सक्रिय हैं जो खुद को यूट्यूबर पत्रकार बताकर सरकारी अधिकारियों पर दबाव बनाते हैं, धमकी देते हैं और कवरेज के नाम पर वसूली के आरोप भी लगते हैं। इससे वास्तविक घटनाओं की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को संदेह की नजर से देखा जाता है।
असली पत्रकारों की परेशानी
वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि जब हर व्यक्ति कैमरा लेकर खबर के नाम पर कुछ भी प्रसारित कर देता है तो लोगों का भरोसा समाचार तंत्र से उठने लगता है। प्रेस कार्ड की कोई जांच नहीं होती और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मोनेटाइजेशन के लालच में सनसनी फैलाने वाली, अधूरी या एकतरफा खबरें चलाई जाती हैं। इससे पुलिस और प्रशासन भी अब सभी मीडिया कर्मियों को एक ही नजर से देखने लगे हैं जिससे फील्ड रिपोर्टिंग में रुकावट आती है।
कानून क्या कहता है
भारत में पत्रकारिता के लिए अलग से कोई लाइसेंसिंग कानून नहीं है लेकिन फर्जी पत्रकारिता पर कार्रवाई के लिए आपराधिक कानून मौजूद हैं। भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 308 के तहत अगर कोई खुद को पत्रकार बताकर धमका कर पैसे या फायदा मांगता है तो जबरन वसूली का मामला बनता है। धारा 318 धोखाधड़ी और धारा 336, 340 जालसाजी के लिए लागू होती है। अगर कोई फर्जी प्रेस कार्ड बनाकर लोगों को गुमराह करता है तो उस पर भी कार्रवाई हो सकती है। इसके अलावा धारा 353 के तहत झूठी खबर या अफवाह फैलाकर सार्वजनिक शांति भंग करने पर 3 साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। केंद्र सरकार की मीडिया एक्रेडिटेशन गाइडलाइंस 2022 के अनुसार अगर कोई पत्रकार देश की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ काम करता है या फर्जी दस्तावेज पेश करता है तो उसकी सरकारी मान्यता 2 से 5 साल तक निलंबित की जा सकती है।
पत्रकारिता के मानक दांव पर
पत्रकारिता का मूल सिद्धांत तथ्य, संतुलन और जवाबदेही है लेकिन फर्जी चैनलों की होड़ में क्लिक और व्यूज के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। इससे न केवल पेशेवर पत्रकारों की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है, बल्कि समाज में भ्रम और अविश्वास भी बढ़ रहा है।
समाधान की जरूरत
जिले के पत्रकारों का कहना है कि प्रशासन को फर्जी प्रेस आईडी और यूट्यूब चैनलों की जांच सख्त करनी चाहिए। जब तक नकली और असली के बीच की रेखा स्पष्ट नहीं होगी, तब तक जनता तक सही सूचना पहुंचना मुश्किल बना रहेगा और पत्रकारिता की विश्वसनीयता कमजोर होती रहेगी। अब इसमें कानूनी पक्ष भी शामिल है और प्रेस क्लब का संदर्भ हटा दिया गया है। क्या आप चाहेंगे कि मैं इसके लिए एक तेज़ हेडलाइन भी बना दूं जो अखबार के पहले पन्ने के लिए उपयुक्त हो?
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