जौनपुर। शहर में 14वें वित्त आयोग के तहत वर्ष 2016–17 में स्वच्छता सुविधाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से कई सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण कराया गया था। प्रत्येक शौचालय पर लगभग 15 से 20 लाख रुपये की लागत प्रस्तावित थी जबकि कुछ निर्माणों पर खर्च 25 लाख रुपये तक पहुँचा। शहर की स्वच्छता और सार्वजनिक उपयोग को ध्यान में रखते हुए इन शौचालयों का निर्माण उस समय बड़ी उपलब्धि माना गया था परंतु नौ वर्ष बीतते-बीतते ये सभी शौचालय अपनी मूल स्थिति से पूरी तरह विपरीत दिखने लगे हैं।
शहर के विभिन्न वार्डों में बने अधिकांश शौचालय अब जर्जर हालत में हैं। कहीं दरवाजे टूट चुके हैं तो कहीं पानी की व्यवस्था पूरी तरह ठप पड़ी है। कई स्थानों पर सीवेज चोक होने से बदबू फैलती रहती है और उपयोगकर्ता इनका इस्तेमाल करने से कतराते हैं। कुछ शौचालय तो इतने खराब हो चुके हैं कि वे पूरी तरह बंद पड़े हैं और अवैध अड्डों में बदलते जा रहे हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद रखरखाव पर कोई ध्यान नहीं दिया गया जिसकी वजह से ये सुविधाएँ आज खंडहर का रूप ले चुकी हैं।
नगर पालिका के जिम्मेदार अधिकारियों से पूछताछ करने पर वे बजट और स्टाफ की कमी का हवाला देते हैं। नगर पालिका अध्यक्षा मनोरमा मौर्य के प्रतिनिधि डा, रामसूरत मौर्य से दूरभाष पर बात करने पर उन्होंने बताया कि शौचालय न चलने की वजह से समस्याएं आई हुई हैं। एक शौचालय सिपाह का जिक्र मैंने किया कि वह पूरी तरीके से बंद है और उसकी टंकी वगैरा ध्वस्त हो गई है तो उन्होंने कहा कि उस टंकी को फिर से बनाने का प्रस्ताव दिया जा रहा है। जल्दी उसको बनवा करके चालू किया जाएगा।
वहीं अधिशासी अधिकारी से बात नहीं हो सकी उनका फोन नहीं उठा जबकि जनता का कहना है कि समस्या की जड़ निगरानी और नियमित देख—रेख के अभाव में है। शहरवासियों ने मांग किया कि इन शौचालयों का या तत्काल पुनर्निर्माण कराया जाए या फिर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो, क्योंकि जनता के टैक्स से बने ये ढांचे अब बेकार पड़े हैं। स्वच्छता मिशन की सफलता के बीच जौनपुर के ये खराब शौचालय एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं- क्या योजनाएँ केवल बनने तक ही सीमित हैं या उनके रख-रखाव की जिम्मेदारी भी उतनी ही गंभीरता से निभाई जानी चाहिए?
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