Jaunpur News: प्रतिबन्धित मांझे के खिलाफ जौनपुर में उठी आवाज को न्यायालय का मिला बल

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अधिवक्ता के घायल होने के मामले में मुकदमा के आदेश से कार्यवाही का रास्ता साफ

विकास तिवारी एडवोकेट की प्रभावी पैरवी बनी अहम कड़ी

जौनपुर। जनपद में प्रतिबंधित चाइनीज/नायलान मांझे के बढ़ते इस्तेमाल सहित इससे आम नागरिकों के जीवन पर मंडरा रहे खतरे के खिलाफ समय-समय पर आवाज उठती रही है। प्रतिबंधित मांझे के कारण जिले में सामने आयी गंभीर घटनाओं ने इसकी भयावहता को उजागर किया है। इसी क्रम में एक अधिवक्ता के प्रतिबंधित मांझे की चपेट में आकर घायल होने के मामले में न्यायालय द्वारा प्राथमिकी दर्ज कर विवेचना के निर्देश दिये जाने से प्रतिबंधित मांझे के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता विकास तिवारी द्वारा चलाए जा रहे अभियान को महत्वपूर्ण न्यायिक बल मिला।

मामला 13 जनवरी 2025 का है। न्यायालय में प्रस्तुत प्रार्थना पत्र के अनुसार अधिवक्ता आशीष शुक्ला अपने साथी अधिवक्ता शिवराज यादव के साथ दीवानी न्यायालय से कार्य समाप्त करने के बाद मोटरसाइकिल से जा रहे थे। शास्त्री पुल के पास पहुंचते ही दोनों प्रतिबंधित मांझे की चपेट में आ गये। मांझे से आशीष शुक्ला के चेहरे और गर्दन पर चोट आई जबकि अधिवक्ता शिवराज के चेहरे एवं गर्दन में मांझा फंसने से नाक और बांई आंख के नीचे गंभीर चोट आई।

घटना के बाद दोनों घायलों को उपचार कराया गया। प्रार्थना पत्र में यह भी आरोप लगाया गया कि शास्त्री पुल के पश्चिमी खाली मैदान एवं छत पर कुछ लोग प्रतिबंधित मांझे से पतंग उड़ा रहे थे और घटना के बाद भी वहां मौजूद लोग तालियां बजाकर उत्सव मना रहे थे। जौनपुर में प्रतिबंधित मांझे से होने वाली दुर्घटनाओं और इसके कारण मनुष्यों के साथ पक्षियों सहित अन्य जीव-जंतुओं को होने वाले नुकसान को लेकर विरोध की आवाज लगातार उठती रही है। प्रतिबंधित मांझे के खिलाफ चलाये गये अभियान का उद्देश्य लोगों को इसके खतरनाक परिणामों के प्रति जागरूक करना और इसके निर्माण, बिक्री तथा इस्तेमाल पर प्रभावी रोक सुनिश्चित कराना रहा है। हाल ही मे जौनपुर के नगर क्षेत्र में दो युवाओं का इसी मांझे से गला कट जाने के कारण निधन भी हो गया।

अधिवक्ता के साथ हुई घटना के बाद थाना लाइन बाजार पुलिस को लिखित सूचना दी गयी लेकिन अपेक्षित कार्यवाही न होने पर पीड़ित पक्ष ने 22 जनवरी 2025 को पुलिस अधीक्षक को प्रार्थना पत्र दिया। इसके बावजूद कार्यवाही न होने पर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया। प्रार्थना पत्र में प्रतिबंधित मांझे के प्रयोग के सम्बन्ध में धारा 15 पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, धारा 11 पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 तथा धारा 223 एवं 109 भारतीय न्याय संहिता 2023 के अंतर्गत कार्रवाई की मांग की गयी थी। पूरे मामले की पैरवी दीवानी न्यायालय के अधिवक्ता विकास तिवारी ने किया।

अधिवक्ता विकास जी ने न्यायालय के समक्ष प्रतिबंधित मांझे से होने वाले खतरे को प्रभावी ढंग से रखते हुए तर्क दिया कि ऐसे मामलों में कार्रवाई केवल घटना के बाद घायल व्यक्ति को उपचार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि प्रतिबंधित मांझे के इस्तेमाल के स्रोत, उसके उपयोग करने वाले व्यक्तियों और उससे उत्पन्न खतरे की भी विधि के अनुसार जांच होनी चाहिए। पैरवी के दौरान उच्च न्यायालय इलाहाबाद एवं राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा प्रतिबंधित मांझे के संबंध में समय-समय पर दिए गए आदेशों एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विधिक प्रावधानों की ओर भी न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया गया।

अधिवक्ता की ओर से यह भी जोर दिया गया कि यदि प्रतिबंधित मांझे के इस्तेमाल से किसी व्यक्ति को चोट पहुंचती है और प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के तथ्य सामने आते हैं तो पुलिस द्वारा विधि के अनुसार प्राथमिकी दर्ज कर निष्पक्ष विवेचना किया जाना आवश्यक है। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पत्रावली पर उपलब्ध सामग्री एवं पक्षकारों के तर्कों का अवलोकन किया। इसके बाद मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मजिस्ट्रेट ने प्रार्थना पत्र स्वीकार करते हुए थाना लाइन बाजार को प्रकरण में सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज कर नियमानुसार विवेचना सुनिश्चित करने का आदेश दिया।

न्यायालय के इस आदेश से अब घटना की जांच का रास्ता साफ हो गया है। पुलिस को घटना में प्रतिबंधित मांझे के इस्तेमाल, मौके पर मौजूद व्यक्तियों तथा उनकी भूमिका समेत मामले के अन्य पहलुओं की विवेचना करनी होगी। प्रतिबंधित मांझे से घायल अधिवक्ता की ओर से न्यायालय में दाखिल यह मामला अब जौनपुर में प्रतिबंधित मांझे के खिलाफ चल रही मुहिम को भी नई दिशा देने वाला माना जा रहा है। लगातार जागरूकता अभियान चलने के बावजूद यदि प्रतिबंधित मांझे का इस्तेमाल लोगों की जान के लिए खतरा बनता है तो उसके विरुद्ध कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस पूरे मामले में अधिवक्ता विकास तिवारी की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही जिन्होंने पीड़ित पक्ष की ओर से मामले को न्यायालय के समक्ष मजबूती से प्रस्तुत किया और प्रतिबंधित मांझे की घटना को व्यक्तिगत चोट से आगे बढ़ाकर जनसुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और कानून के प्रभावी अनुपालन से जुड़े व्यापक विषय के रूप में न्यायालय के सामने रखा।  मामले के मुख्य पैरवीकर्ता अधिवक्ता विकास तिवारी के अनुसार न्यायालय के आदेश को प्रतिबंधित मांझे के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की दिशा में एक महत्वपूर्ण न्यायिक कदम माना जा रहा है।

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