आरएल पाण्डेय/शुभम जायसवाल
लखनऊ। साहित्य भूषण कमलेश मौर्य मृदु की अध्यक्षता में राष्ट्रीय कवि संगम लखनऊ उत्तर इकाई की कवि गोष्ठी हुई। डा. रेनू सिंह के जानकीपुरम स्थित आवास पर हुई कवि गोष्ठी का संचालन उपेन्द्र सिंह ने किया। गोष्ठी का शुभारंभ डा. रेनू सिंह ने प्रस्तुत मां सरस्वती की वंदना से किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे राष्ट्रीय कवि संगम के राष्ट्रीय मंत्री कमलेश मौर्य मृदु ने कहा—— गफलत में बहुत दिनों तक सोते रहे वक्त का तकाजा है कि जागो दूर नींद हो। पूजा करे कोई या नमाज पढ़ें चर्च जाए किन्तु" मृदु" मन मातृभूमि का मुरीद हो। पाक , बांगला की सीमा तोड़ के तिरंगा फहराने की तमन्ना लिए हर युवा हमीद हो। भारत के टुकड़े पुनः मिलें भारत में दिल की जो दूरियां मिटें यों सच्ची ईद हो।
श्री मृदु ने कुर्बानी और बलि प्रथा दोनों को वास्तविकता और धार्मिकता से परे बताते हुए स्वार्थ और स्वाद से प्रेरित बताया साथ ही सच्ची कुर्बानी को रेखांकित करते हुए कहा—— परहित खुद को अर्पित करना जिसकी परंपरा बलिदानी। हम सनातनी बतलाते हैं क्या होती सच्ची कुर्बानी। हाथों में ले कृपाण बनबीर उदय को मारने आया था। तब पन्ना धाय ने अपने पुत्र को उसकी जगह लिटाया था। युवराज उदय सिंह को ले जाकर अलग से कहीं छुपाया था। अपने दिल के टुकड़े चंदन की बलि दे उसे बचाया था।। युवराज की जगह चंदन की गर्दन पर जब तलवार चली। बहकर कृपाण से टप-टप टप-टप टप-टप रक्त की धार चली।। खुल जाय न भेद कहीं पन्ना की आंख से बहा नहीं पानी। निरीह पशुओं के हंताओं यह होती सच्ची कुर्बानी।
कवयित्री डा. रेनू सिंह के मुक्तक बहुत सराहे गये—— वेद की मैं ऋचा प्रेम सोपान हूँ। मैं तो माधव की गीता का मृदु गान हूँ। कोई गुड़िया नहीं हूँ सजावट की मैं, धर्म की मैं ध्वजा सच की पहचान हूँ। संचालन कर रहे उपेन्द्र सिंह ने प्रेम गीत सुना कर सबका मन मोह लिया—— बोलो कैसे गीत लिखूं मैं। कैसे तुमको धड़कन लिख दूँ, कैसे तुमको मीत लिखूं मैं।। मन पनघट है उजड़ा उजड़ा, सूना है भावों का आँगन। उर उपवन में शिशिर समाया—— निष्ठुर प्रीति हुई बैरागन। तनहाई के कोलाहल को कैसे मृदु संगीत लिखूं मैं। इसके अतिरिक्त व्यंग्यकार विजय तन्हा, प्रगति बाजपेई, अतुल बाजपेई अतुल, मुंशी रामलखन मौर्य ने अपनी रचनाओं से कवि गोष्ठी को यादगार बनाया। निहारिका सिंह ने सभी का स्वागत किया तो निखिल सिंह ने आभार प्रकट किया।
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