वाराणसी। अघोर परम्परा को जन-जबन संग जोड़ने वाले और 20वीं सदी के महानतम संतों में से एक अघोरेश्वर महाप्रभु अवधूत भगवान रामजी को आध्यात्मिक जगत में शीर्ष स्थान हासिल है। अपनी अद्भुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय, अध्यात्मिक शक्ति से लाखों लोगों का कल्याण करने वाले अघोरेश्वर महाप्रभु को करोड़ों लोग जानते हैं, मानते हैं। वाराणसी में रविन्द्रपुरी स्थित अघोर के विश्वविख्यात केंद्र 'बाबा कीनाराम स्थल, क्रीं-कुण्ड' से अघोर दीक्षा के बाद अपने गुरु की आज्ञा से आपने मानव सेवा का व्रत लिया। "मानव सेवा ही ईश्वर प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है" जैसा सन्देश अनवरत देते हुए 29 नवंबर 1992 को आपने अपनी स्थूल काया का परित्याग कर समाधि ले लिया। सम्पूर्ण अघोर (औघड़) परम्परा में अघोर श्रद्धालु-भक्त-साधक-महात्मा जन इस दिन (29 नवंबर) को 'महानिर्वाण दिवस' के रूप में मनाते हैं।
इसी कड़ी में 29 नवंबर को अघोरेश्वर महाप्रभु का 33वां महानिर्वाण दिवस 'बाबा कीनाराम स्थल क्रीं-कुण्ड' सहित हरेक अघोर आश्रमों में श्रद्धा-भक्ति और विश्वास के साथ मनाया गया। 'क्रीं-कुण्ड' में सुबह साफ़-सफ़ाई और दैनिक आरती के बाद परिसर में स्थित अघोरेश्वर महाप्रभु के समाधि स्थल पर भक्त समुदाय द्वारा महाप्रभु की प्रतिमा पर माल्यार्पण के बाद पूजा कर उनकी आरती की गयी और 'सफ़ल योनि' का पाठ किया गया। तदुपरांत भक्तों द्वारा अघोरेश्वर महाप्रभु द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया गया। इसके बाद श्रद्धालुओं द्वारा "अघोरान्नाम परो मंत्रः नास्ति तत्वं गुरोः परम" और "सर्वेश्वरी त्वं पाहिमाम शरणागतम" के मन्त्रों का जाप किया। अंत में भंडारा के तहत भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया।
'क्रीं-कुण्ड' के अलावा अन्य अघोर आश्रमों में भी महानिर्वाण दिवस पर अपार श्रद्धा के साथ लोगों ने अपने आराध्य को पुष्पांजलि अर्पित किया। धार्मिक औपचारिकताओं के साथ कई आश्रमों में सामाजिक-सरोकार से भी जुड़े अनेकों कार्यक्रम रखे गए। कम्बल-वितरण, वस्त्र-वितरण और 'नेत्र चिकित्सा शिविरों' का आयोजन कर ज़रुरतमंद लोगों तक पहुँचने की कोशिश की गयी। ग़ौरतलब है कि अघोरेश्वर महाप्रभु ने न सिर्फ़ अध्यात्म, बल्कि मानवीय सेवा के क्षेत्र में भी अद्भुत मिसाल क़ायम किया। आपने समाज के सबसे तिरस्कृत प्राणियों, कुष्ठी बंधुओं की सेवा का व्रत लिया और आजीवन करते रहे।
मानव सेवा के सतत प्रवाह को जारी रखने के लिए आपने '19 सूत्रीय कार्यक्रम' का प्रतिपादन किया। सामाजिक सरोकार से सीधे तौर पर जुड़े इन कार्यक्रमों में यथासंभव सहयोग और इसे ज़मीनी स्तर पर क्रियान्वित करने का पुरज़ोर प्रयास अघोर श्रद्धालुजन हमेशा करते हैं। धार्मिक-आध्यात्मिक परंपरा में इस तरह का उदाहरण देखने को बहुत कम मिलता है। अघोर श्रद्धालु-साधक जन, आज भी अघोरेश्वर महाप्रभु बाबा अवधूत भगवान् राम जी को ईश्वर के विकल्प के तौर पर पूजते हैं।
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