गणेश चतुर्थी और भगवान गणेश

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गणेश चतुर्थी और भगवान गणेश

डा. दिलीप सिंह एडवोकेट

भगवान गणेश देवताओं में प्रथम पूज्य हैं, क्योंकि उन्होंने अपने माता-पिता की परिक्रमा करके यह आशीर्वाद प्राप्त किया है और उनका व्रत लगभग हर महीने चतुर्थी तिथि पर पड़ता रहता है। इस वर्ष भादो महीने में यह चतुर्थी जिसे गणेश चतुर्थी या संकष्टी चतुर्थी या हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। 12 अगस्त के मंगलवार के दिन पड़ रही है। भादो घनघोर बारिश का महीना होता है और चारों ओर पानी ही पानी भरा रहता है। भादो महीने के बारे में कहा जाता है। भादो मूसलाधार बहाता खेतों में सब चीज उगाता।

इस वर्ष 12 अगस्त को मंगलवार के दिन गणेश चतुर्थी पड़ रहा है और सुबह 8:40 से लेकर 6:35 13 अगस्त को समाप्त हो रहा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि गणेश पूजन के लिए सबसे अच्छा शुभ मुहूर्त कौन है। शास्त्रों के अनुसार गणेश जी का पूजन गोधूलि बेला में किया जाता है। मंगलवार को यह समय 12 अगस्त को शाम बस 6:50 से शाम 7:16 तक है।

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न गणेश चतुर्थी को गणेश जी की पूजा कैसे की जाती है। इसका विधान भी अन्य पूजा की तरह ही होता है। सर्वप्रथम नित्य क्रिया करके स्नान ध्यान करके पूजा के स्थान को स्वच्छ बनाकर वहां एक चौकी स्थापित की जाती है। चौकी को लाल वस्त्र से ढका जाता है और उसे पर भगवान गणेश की प्रतिमा या छायाचित्र रखा जाता है। इसके बाद गणेश जी का अभिषेक करते हैं। अर्थात उन्हें जल से या गंगाजल से स्नान करते हैं। इसके बाद उन्हें प्रिय लगने वाले फल फूल और लड्डू तथा दूब चढ़ाते हैं। वैसे तो बहुत सी चीज चढ़ाया जा सकता है लेकिन सामान्य जनता के लिए इतना ही बहुत है।

इसके बाद गणेश जी का संकल्प करके गणपति के किसी भी मंत्र का जाप किया जाता है। जैसे ऊं गं गणपतए नमः या फिर वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ निर्विघ्नम कुरु में देव सर्व कार्यषु सर्वदा और फ्री हम मंत्र जाप करके आरती किया जाता है। आरती करने के बाद प्रसाद अधिक से अधिक लोगों में बांट दिया जाता है।

इसके बाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य गणेश जी का दर्शन करके चंद्रमा को आसमान में दर्शन करने का विधान है। इस वर्ष 12 अगस्त को उत्तर भारत में 9 बजे चंद्रमा का उदय होगा। अगर घने बादल होने या किसी अन्य वजह से चंद्रमा का दर्शन ना हो पाय तो 9:30 बजे मन में संकल्प करके चंद्रमा की पूजा सच्चे मन से करना चाहिए। पूजा करने के बाद व्रत का समापन किया जाता है। अगले दिन पारन किया जाता है अर्थात भोजन ग्रहण किया जाता है। शुद्ध चित्त से और पाप रहित होकर गणेश जी का व्रत करने से इच्छित मनोकामना की पूर्ति होती है।


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