वैभव वर्मा
जौनपुर। जनपद में कई ऐसे लोग हैं जिनका मानना है कि आदि गंगा मां गोमती के जल प्रवाह में प्रतिमा विसर्जन से प्रदूषण होता है। ऐसे लोगों का ध्यान लेकर चलता हूं जनपद के बीचों—बीच जहां पता नहीं कब से गोमती में प्रदूषण हो रहा है। उस तरफ न नगर पालिका अध्यक्ष, न सदर विधायक और न ही जिला प्रशासन का ध्यान जाता है।
वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अभियान के तहत कार्य कर रहे हैं लेकिन उनका मानना है कि बस प्रतिमा विसर्जन करने से ही गोमती का जल दूषित हो रहा है जबकि उनका ध्यान उस तरफ क्यों नहीं जाता जहां पूरा हनुमान घाट मोहल्ले का दूषित पानी नाला से निकलता हुआ गोमती की पावन धारा में मिल रहा है। क्या उससे ही गोमती का जल दूषित नहीं हो रहा है? याचिका दाखिल हर जगह हुआ होगा लेकिन उसका सख्ती से पालन केवल जौनपुर में ही दिख रहा है, ऐसा क्यों? अगल—बगल के जनपद सहित कई जगह नदी में प्रतिमा विसर्जन के लिये रोका गया था लेकिन वहां की जानता इस बात को न मानते हुये धरने पर उतर आयी। परिणाम रहा कि वहां आज भी छोटी प्रतिमा नदी में ही विसर्जित होती हैं और जितनी भी बड़ी प्रतिमा हैं, उसके लिये अब नगर पालिका परिषद ने अलग से प्रबन्ध करवाया है।
इतना कहना है कि प्रतिमा विसर्जन से बहुत दूषित नहीं होता। दूषित होने का जो असली जड़ एवं वजह है, उसका निवारण करना चाहिये। पूरे शहर का गन्दा पानी हनुमान घाट की गली से होते हुये गोमती के जल में समहित होता है। इससे गोमती नदी अत्यन्त दूषित होता है। उसको रोकने के लिये प्लांटेशन या प्यूरिफाई मशीन लगवाना चाहिये जिस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। बस ध्यान जा रहा है तो देवी—देवताओं के विसर्जन का। एक भी प्रतिमा नदी में नहीं होना चाहिये।
प्रशासन का यही मानना है लेकिन जो असली कारण है, 2 माह के बाद उस पर कोई चर्चा ही नहीं होता। आदि मां गोमती का जल प्रवाह प्रदूषित होता चला रहा है जो बीमारियों का घर बनता चला जा रहा है। आज से 15 साल पहले लोग गोमती के नदी के पानी में लोग हाथ—पैर धोने जाते थे तो एक घूंट पी भी लेते थे लेकिन आज पीने के बात छोड़िये, हाथ—पैर भी धुलना पसन्द नहीं करते। मेरा बस इतना कहना है कि यह सोचनीय विषय है, इस पर गहन चर्चा की आवश्यकता है।
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