सभी पापों को हरने वाला है महाशिवरात्रि | #AAPKIUMMID - उम्मीद

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Friday, February 14, 2020

सभी पापों को हरने वाला है महाशिवरात्रि | #AAPKIUMMID

देवाधिदेव महादेव का निराकार से साकार रूप में प्रकटीकरण का यह महान पर्व में रात्रि का विशेष महत्व है। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि कहा गया है। इस पर्व में व्रत विशेष महत्व रखता है। यह पर्व फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनाया जाता है। इस दिन का व्रत रखने से भगवान भोले नाथ शीघ्र प्रसन्न होकर उपासक की मनोकामना पूरी करते हैं। यही वजह है कि इस व्रत को सभी स्त्री-पुरुष, बच्चे, युवा व बुजुर्ग रखते हैं। कहते है विधि पूर्वक व्रत रखने और शिवपूजन, शिव कथा, शिव स्रोतों का पाठ करते हुए रात्रि जागरण करने से हजार अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। व्रत के दूसरे दिन ब्राह्माणों को यथा शक्ति वस्त्र-क्षीर सहित भोजन, दक्षिणा आदि प्रदान करके संतुष्ट किया जाता है।
सुरेश गांधी
इस साल महाशिवरात्रि का पर्व 21 फरवरी को शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के मुताबिक, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन शिव और पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। मान्यता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव पर एक लोटा जल चढ़ाने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। 21 तारीख को शाम को 5 बजकर 20 मिनट से 22 फरवरी, शनिवार को शाम सात बजकर 2 मिनट तक रहेगा।
देवों के देव महादेव भगवान शिव-शंभू, भोलेनाथ शंकर की आराधना, उपासना का त्योहार है महाशिवरात्रि। यह पर्व पूरे देश में पूर्ण श्रद्धाभाव के साथ मनाया जाता है। वैसे तो पूरे साल शिवरात्रि का त्योहार दो बार आता है लेकिन फाल्गुन महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी अर्थात अमावस्या से एक दिन पहले वाली रात को महाशिवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य देव भी इस समय तक उत्तरायण में आ चुके होते हैं तथा ऋतु परिवर्तन का यह समय अत्यन्त शुभ माना गया है। भगवान शंकर सबका कल्याण करने वाले हैं। अतः महाशिवरात्रि पर सरल उपाय करने मात्र से ही सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। जहां महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है वहीं युवतियां अच्छे वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत करती हैं। जबकि छात्र वर्ग को विद्या का वरदान मिलता है। वहीं महाशिवरात्रि का दिन किसी भी शुभ के लिए श्रेष्ठ होता है। महाशिवरात्रि को रात के समय शिवलिंग व शिव मूर्ति की पूजा का विशेष महत्व है।
वास्तव में शिव की महिमा अपरंपार है। जिनके कोष में भभूत के अतिरिक्त कुछ नहीं है परंतु वह निरंतर तीनों लोकों का भरण पोषण करने वाले हैं। परम दरिद्र शमशानवासी होकर भी वह समस्त संपदाओं के उद्गम हैं और त्रिलोकी के नाथ हैं। अगाध महासागर की भांति शिव सर्वत्र व्याप्त हैं। वह सर्वेश्वर हैं। अत्यंत भयानक रूप के स्वामी होकर भी स्वयं शिव हैं। शिव अनंत हैं। शिव की अनंतता भी अनंत है। शिव स्वयं आनंदमय हैं। कहते है मानव जब सभी प्रकार के बंधनों और सम्मोहनों से मुक्त हो जाता है तो स्वयं शिव के समान हो जाता है। समस्त भौतिक बंधनों से मुक्ति होने पर ही मनुष्य को शिवत्व प्राप्त होता है। ज्योतिष गणना के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जाते हैं। इस कारण बलहीन चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा देने में असमर्थ हो जाते हैं। चंद्रमा का सीधा संबंध मन से कहा गया है। मन कमजोर होने पर भौतिक संताप प्राणी को घेर लेता है तथा विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है। इससे कष्टों का सामना करना पड़ता है। चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान हैं और ऐसे में उनकी आराधना करने मात्र से ही सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
भगवान शंकर आदि-अनादि हैं और सृष्टि के विनाश व पुनः स्थापना के बीच की कड़ी हैं। भगवान शंकर को सुखों का आधार मान कर महाशिवरात्रि पर अनेक प्रकार के अनुष्ठान करने का महत्व है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, इस सृष्टि से पहले सत और असत नहीं थे, केवल भगवान शिव थे। जो सर्वस्व देने वाले हैं। विश्व की रक्षार्थ स्वयं विष पान करते हैं। अत्यंत कठिन यात्रा कर गंगा को सिर पर धारण करके मोक्षदायिनी गंगा को धरा पर अवतरित करते हैं। श्रद्धा, आस्था और प्रेम के बदले सब कुछ प्रदान करते हैं। शिव की शक्ति रात्रि ही है जो विश्व के समस्त प्राणियों को जीने की राह सिखाता है। बताता है सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है, इसके सिवाय कुछ भी नहीं है। अर्थात शिव और शिवत्व की दिव्यता को जान लेने का महापर्व है महाशिवरात्रि। महाशिवरात्रि शिव और पार्वती के वैवाहिक जीवन में प्रवेश का दिन होने के कारण प्रेम का दिन है। यह प्रेम त्याग और आनंद का पर्व है। शिव स्वयं आनंदमय हैं। कहते है मानव जब सभी प्रकार के बंधनों और सम्मोहनों से मुक्त हो जाता है तो स्वयं शिव के समान हो जाता है। समस्त भौतिक बंधनों से मुक्ति होने पर ही मनुष्य को शिवत्व प्राप्त होता है।
शिव को देवाधिदेव महादेव इसलिए कहा गया है कि वे देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, किन्नर, गंधर्व पशु-पक्षी एवं समस्त वनस्पति जगत के भी स्वामी हैं। शिव की अराधना से संपूर्ण सृष्टि में अनुशासन, समन्वय और प्रेम भक्ति का संचार होने लगता है। इसीलिए, स्तुति गान है- मैं आपकी अनंत शक्ति को भला क्या समझ सकता हूं। हे शिव, आप जिस रूप में भी हों, उसी रूप को मेरा प्रणाम। शिव यानी ‘कल्याण करने वाला’। शिव ही शंकर हैं। शिव के ‘श’ का अर्थ है कल्याण और क का अर्थ है करने वाला। शिव, अद्वैत, कल्याण- ये सारे शब्द एक ही अर्थ के बोधक हैं। शिव ही ब्रह्मा हैं, ब्रह्मा ही शिव हैं। ब्रह्मा जगत के जन्मादि के कारण हैं। शिव और शक्ति का सम्मिलित स्वरुप हमारी संस्कृति के विभिन्न आयामों का प्रदर्शक है। शिव औघड़दानी है और दुसरों पर सहज कृपा करना उनका सहज स्वभाव है। अर्थात शिव सहज है, शिव सुंदर है, शिव सत्य सनातन है, शिव सत्य है, शिव परम पावन मंगल प्रदाता है, शिव कल्याणकारी है, शिव शुभकारी है, शिव अविनाशी है, शिव प्रलयकारी है, इसीलिए तो उनका शुभ मंगलमय हस्ताक्षर सत्यम् शिवम् सुन्दरम्, को सभी देव, दानव, मानव, जीव-जंतु, पशु-पक्षी चर-अचर, आकाश-पाताल, सप्तपुरियों में शिव स्वरुप महादेव के लिंग का आत्म चिंतन कर धन्य होते हैं। यह कटु सत्य है। ओउम् नमः शिवाय, यह शिव का पंचाक्षरी मंत्र है।
मान्यता है कि इस व्रत को जो जन करता है, उसे सभी भोग की प्राप्ति के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत सभी पापों का क्षय करने वाला है और इस व्रत को लगातार 14 वर्षो तक करने के बाद विधि-विधान के अनुसार इसका उद्यापन कर देना चाहिए। व्रत का संकल्प सम्वत, नाम, मास, पक्ष, तिथि-नक्षत्र, अपने नाम व गोत्रादि का उच्चारण करते हुए करना चाहिए। महाशिवरात्रि के व्रत का संकल्प करने के लिए हाथ में जल, चावल, पुष्प आदि सामग्री लेकर शिवलिंग पर छोड़ दी जाती है। महाशिवरात्रि पर इस बार 59 साल बाद शश योग रहेगा। यह योग साधना की सिद्धि के लिए विशेष महत्व रखता है। साधना की सिद्धि के लिए तीन सिद्ध रात्रियां विशेष मानी गई है। इनमें शरद पूर्णिमा को मोहरात्रि, दीपावली की कालरात्रि तथा महाशिवरात्रि को सिद्ध रात्रि कहा गया है। इस बार महाशिवरात्रि पर चंद्र शनि की मकर में युति के साथ पंच महापुरुषों में शश योग बन रहा है। आमतौर पर श्रवण नक्षत्र में आने वाली शिवरात्रि तथा मकर राशि के चंद्रमा का योग बनता ही है। लेकिन 59 साल बाद शनि के मकर राशि में होने से तथा चंद्र का संचार अनुक्रम में शनि के वर्गोत्तम अवस्था में शश योग का संयोग बन रहा है। चूंकी चंद्रमा मन तथा शनि ऊर्जा का कारक ग्रह है। चंद्रमा को कला तथा शनि को काल पुरुष का पद प्राप्त है। ऐसी स्थिति में कला तथा काल पुरुष के युति संबंध वाली यह रात्रि सिद्ध रात्रि की श्रेणी में आती है। इस दिन पांच ग्रहों की राशि पुनरावृत्ति होगी। शनि व चंद्र मकर राशि, गुरु धनु राशि, बुध कुंभ राशि तथा शुक्र मीन राशि में रहेंगे। इससे पहले ग्रहों की यह स्थिति 1961 में बनी थी।
महाशिवरात्रि पर सर्वार्थसिद्धि योग का संयोग भी है। इस योग में शिव पार्वती का पूजन श्रेष्ठ माना गया है। फाल्गुन मास का आरंभ व समापन सोमवार के दिन होगा। माह में पांच सोमवार आएंगे। फाल्गुन मास में वार का यह अनुक्रम कम ही दिखाई देता है। इसके प्रभाव से देश में सुख शांति का वातावरण निर्मित होगा। साथ ही व्यापार व्यवसाय में वृद्धि होगी। शिवरात्रि पर चार प्रहर पूजन का विधान है. किंतु निशीथ काल पूजन उत्तम मानी जाती है, जिसका विशेष महत्व है। इस बार पंचांग के अनुसार महाशिवरात्रि में पूजन का श्रेष्ठ निशीथ काल प्रहर का मुहूर्त रात्रि 11ः49 से 12ः39 तक है। वहीं ज्योतिष की दृष्टि में महाशिवरात्रि का व्रत शुक्रवार, उत्तराषाढ़ा तदोपरांत श्रवण नक्षत्र का योग विशेष संयोग बना रहा, जिससे इस दिन शिव शंकर का पूजन अर्चन करना अत्यंत फलदायी माना जा रहा है। प्रदोषकाल व महानिशीथ काल में चतुर्दर्शी का योग भी अपने आप मे श्रेष्ठ कर हैं। महाशिवरात्रि व्रत का पारण 22 फरवरी शनिवार को प्रातः काल कर लिया जायेगा। स्कंदपुराणानुसार शिव मंदिर में दीप दान करने बृषभ उत्सर्ग (छोड़ना) या दान करने से शुभफल इंद्र के समान ऐश्वर्य श्री की प्राप्ति होती है। ज्योतिष की दृष्टि से बारह राशियों (सूर्यादि द्वादश राशि) के जातकों के द्वारा किस शिवलिंग की पूजन करना श्रेष्ठ व उत्तम फलदायक होगा। वर्षभर में कुल 12 शिवरात्रियां होती हैं। उसमें फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात्रि महाशिवरात्रि के नाम से प्रसिद्ध है। संहार शक्ति व तमोगुण के अधिष्ठाता शिव की रात्रि महाशिवरात्रि शिव आराधना की सर्वश्रेष्ठ रात्रि है। इस बार शिवरात्रि पर त्रयोदशी के साथ चतुर्दशी का संयोग चारों प्रहर की पूजा को कुछ खास बना रहा है। इसी महारात्रि में जीवन रूपी चंद्र का शिव रूपी सूर्य से सम्मिलन होगा। यही महाशिवरात्रि का महत्व है क्योंकि चतुर्दशी के स्वामी स्वयं शिव हैं।

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