जौनपुर: गीत-संगीत में फूहड़ता के चलते आई है सामाजिक मूल्यों में गिरावट: तृप्ति शाक्या | #AAPKIUMMID - उम्मीद

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Sunday, November 4, 2018

जौनपुर: गीत-संगीत में फूहड़ता के चलते आई है सामाजिक मूल्यों में गिरावट: तृप्ति शाक्या | #AAPKIUMMID

नानक चंद्र त्रिपाठी
मुंगराबादशाहपुर, जौनपुर। सिने जगत की मशहूर पार्श्व गायक एवं हिंदी तथा भोजपुरी गीतों के माध्यम से लगभग 3 दशकों से सब के दिलों पर राज करने वाली सुरीली आवाज की धनी तृप्ति शाक्या ने नगर के गुड़हाई मोहल्ले में स्थित पीसीसी सदस्य विश्वनाथ गुप्ता के आवास पर पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि आज के समय में फूहड़ता परोसे जाने वाले गीत-संगीत के कारण सामाजिक मूल्य में गिरावट आई है।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में युवा वर्ग जिस प्रकार से पाश्चात्य संस्कृति की ओर आकर्षित हो रहा हैं। उसी में हमारे तमाम सिने जगत के लोग भी अपने व्यवसाय के चक्कर में सहयोगी बनते जा रहे हैं जिससे हमारे समाज में जहां एक और नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है। वहीं हमारी सामाजिक संरचना भी विकृति होती जा रही है। साथ ही हमारी संस्कृति और सभ्यता को लोग भूलते जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि दशकों पहले मैंने टी सीरीज के साथ मिलकर भगवान श्री कृष्ण के भजन का एलबम सूट किया जिसने मुझे गीत-संगीत की इस दुनिया में प्रसिद्धि दिलाते हुए मुझे इस मुकाम तक पहुंचाया। किसी भी गीत एवं संगीत का निर्माण करते समय इस बात अवश्य ध्यान देना चाहिए कि इससे हमारे देश के युवा वर्ग, हमारी संस्कृति एवं हमारी सभ्यता पर इसका क्या असर पड़ेगा। क्योंकि जो काम हमारे देश के बड़े-बड़े नेता और राजनीतिज्ञ नहीं कर पाते, वह बड़ा से बड़ा काम हमारे बॉलीवुड और सिने जगत के लोग आसानी से कर ले जाते हैं। क्योंकि बॉलीवुड एवं सिने जगत को मानने वाले लोगों की संख्या देश में बहुतायत है। ऐसी स्थिति में हम सभी का यह नैतिक कर्तव्य बनता है कि हम अपने गीत-संगीत एवं फिल्मों में हमेशा अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति एवं अपने समाज को संस्कारित एवं शिक्षित बनाने के साथ अपने युवाओं को एक सही रास्ता दिखाने के लिए कार्य करें।
देश में आए दिन महिलाओं एवं बच्चियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार एवं आपराधिक घटनाओं के बारे में पूछे जाने पर तृप्ति शाक्या ने कहा कि यह हमारे देश की विडंबना है कि आजादी के लगभग 75 सालों के बाद भी हमारे देश में महिलाएं एवं बच्चियां सुरक्षित नहीं है। हमारे देश की सरकारें भी बेटी बढ़ाओ बेटी पढ़ाओ का नारा तो जरूर देती हैं लेकिन उन्हें आगे बढ़ाने के लिए सुरक्षित और निर्भीकता का माहौल नहीं उपलब्ध करा पाती। समाज के हर वर्ग, हर धर्म के लोगों को यह चाहिए कि वह हमारी प्राचीन संस्कृति एवं सभ्यता से सीख लें। महिलाओं एवं बेटियों के विषय में गंभीरता से सोचे क्योंकि हर कोई बेटी किसी की बहन बनेगी, किसी की बहू बनेगी, किसी की पत्नी बनेगी और किसी की मां बनेगी। ज़रा आप सोचिए कि यदि उसे कलंकित कर दिया जाएगा तो आगे चलकर वह जहां जाएगी वह परिवार भी तो कलंकित होगा। जब तक हम पुरुष वर्ग के लोग स्वयं जागरूक नहीं होंगे। महिलाओं व बच्चियों के विषय में गंभीरतापूर्वक नहीं सोचेंगे तब तक महिला सुरक्षा की बात करना भी बेमानी होगी। इस मौके पर देवी प्रसाद गुप्त, टिंकू गुप्त, गणेश गुप्त, बॉर्बी गुप्त आदि उपस्थित रहे।




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