पितृ हुए संतुष्ट तो मिलेगा स्वर्गलोक का आर्शीवाद... | #AAPKIUMMID - उम्मीद

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Thursday, September 27, 2018

पितृ हुए संतुष्ट तो मिलेगा स्वर्गलोक का आर्शीवाद... | #AAPKIUMMID

हमारी परंपरा में पुर्नजन्म की अवधारणा है। ऐसे में हम सिर्फ इसी जन्म में अपने कर्म के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि पूर्व जन्मों में किए गए कर्मो के लिए भी हमारा उत्तरदायित्व हैं। हमारे अपने कर्म हमारे दुखों का कारण बनते है। जो लोग अपने पूर्वजों को, पितरों को तर्पण, दान आदि से प्रसंन करते है और अपने पितरों का श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करते है उनके पितर संतुष्ट उन्हें आयु, धन, संपदा, संतान व सौभाग्य आदि का आर्शीवाद प्रदान करते है। भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक का समय पितृ पर्व के रुप में मनाया जाता है। इसमें हम पितृ स्मरण करते है, जिसे श्राद्ध पर्व भी कहते हैं। इसमें पिंडदान और तर्पण का विधान सर्वोपरि है। कहते हैं तर्पण के जरिए ही पितृ मोक्ष प्राप्त करते हैं। वैसे भी श्राद्धकर्म केवल कर्मकांड नहीं है। यह अपने पितरों के लिए हमारे मन की श्रद्धा, प्यार, कृतज्ञता का दरख्वाश है कि उन्होंने हमें जीवन दिया, हर प्रकार की उन्नति दी, धरती पर चलना-बोलना सिखाया। समाज की मुख्यधारा में चलने योग्य बनाया। ऐसे मातृ-पितृ ऋण को हम भला कैसे भूल सकते हैं।
सुरेश गांधी
वैसे भी श्राद्धकर्म केवल कर्मकांड नहीं है, यह अपने पितरों के लिए हमारे मन की श्रद्धा, प्यार, कृतज्ञता का निवेदन है कि उन्होंने हमें जीवन दिया, सब प्रकार की उन्नति कर सुखोपभोग करने योग्य बनाया, उनके प्यार और आशीर्वाद से हम फूले-फलें। ‘श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम‘ अर्थात पितरों की तृप्ति के लिए सनातन विधि से श्रद्धापूर्वक जो कर्म किये जाते हैं, उन्हें श्राद्ध कहते हैं। अग्नि पुराण के अनुसार, वसु, रुद्र एवं आदित्य श्राद्ध के देवता माने गए हैं। इनका आह्वान कर किए गए श्राद्ध से पितर संतुष्ट होते हैं। कहते हैं 8 वसु, 11 रुद्र और 12 आदित्य हैं, इनसे ही सृष्टि की रचना हुई है। वैसे भी मनु स्मृति में मनुष्य के तीन पूर्वजों यथा पिता, पितामह एवं प्रपितामह इन सभी पितृ-देवों को वसुओं, रुद्रो एवं आदित्यों के समान माना गया है। श्राद्ध करते समय इन्हीं देवताओ को पूर्वजों का प्रतिनिधि मानना चाहिए और सच्चे मन से श्राद्ध की संपूर्ण क्रियाएं करना चाहिए। इससे समस्त पितरों को शांति मिलती हैं। पितृ पक्ष अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने, उनका स्मरण करने और उनके प्रति श्रद्धा अभिव्यक्ति करने का महापर्व है। इस अवधि में पितृगण अपने परिजनों के समीप विविध रूपों में मंडराते हैं और अपने मोक्ष की कामना करते हैं। परिजनों से संतुष्ट होने पर पूर्वज आशीर्वाद देकर हमें अनिष्ट घटनाओं से बचाते हैं। ज्योतिष मान्यताओं के आधार पर सूर्य देव जब कन्या राशि में गोचर करते हैं, तब हमारे पितर अपने पुत्र-पौत्रों के यहां विचरण करते हैं। विशेष रूप से वे तर्पण की कामना करते हैं। श्राद्ध से पितृगण प्रसन्न होते हैं और श्राद्ध करने वालों को सुख-समृद्धि, सफलता, आरोग्य और संतान रूपी फल देते हैं। पितृ पक्ष के दौरान वैदिक परंपरा के अनुसार ब्रह्मवैवर्तपुराण में यह निर्देश है कि इस संसार में आकर जो सद्गृहस्थ अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान, तिलांजलि और ब्राह्मणों को भोजन कराते है, उनको इस जीवन में सभी सांसारिक सुख और भोग प्राप्त होते हैं। वे उच्च शुद्ध कर्मों के कारण अपनी आत्मा के भीतर एक तेज और प्रकाश से आलोकित होते है। मृत्यु के उपरांत भी श्राद्ध करने वाले सदगृहस्थ को स्वर्गलोक, विष्णुलोक और ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

मुहूर्त एवं तिथि
पितरों के प्रति श्रद्धा और नमन का पर्व पितृपक्ष भले ही 25 सितंबर से शुरू हो रहा है लेकिन 24 सितंबर सोमवार की दोपहर में भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा का मान मिलने से पूर्णिमा को मृत्यु पाए पितरों का तर्पण-श्राद्ध कर्म करना श्रेयस्कर रहेगा। अगले दिन मंगलवार सुबह 25 सितंबर से अश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा लगने पितृपक्ष में पितरों का पूजन-तर्पण उसी दिन से शुरू हो जायेगा। पितृपक्ष की जिन तिथियों में पितरों-पूर्वजों की मृत्यु हुई हो, जजमानों को उन्हीं तिथियों में अपने पितर का तर्पण करना चाहिये। इसके अलावा प्रतिदिन भी श्राद्ध करना चाहिए। ज्योतिषियों के मुताबिक 24 तारीख की सुबह 6ः36 बजे के बाद से पूर्णिमा का मान शुरू हो जायेगा, जो 25 की सुबह 7ः41 बजे तक रहेगा। इसलिए षोडशी श्राद्ध करने वालों को 24 सितंबर की दोपहर ही पूर्णिमा को मृत्यु पाए पितरों का श्राद्ध करना उत्तम रहेगा। जबकि 25 सितंबर को प्रतिपदा से पितृपक्ष की तिथिवार तर्पण होगा। पितृपक्ष की जिन तिथियों में पितरों-पूर्वजों की मृत्यु होती है, जजमानों को उन्हीं तिथियों में अपने पितर का तर्पण करना चाहिए। सुबह 11 बजकर 33 मिनट से 12 बजकर 21 मिनट के मध्य पितृपक्ष के श्राद्ध का बेहतर समय रहता है। 
अमावस्या का श्राद्ध 8 अक्तूबर को
अकाल मृत्यु पाये, शस्त्रों से मृत्यु पाये या जिनका मृत्यु काल स्पष्ट न हो उन्हें अमावस्या को तर्पण करना चाहिये। अमावस्या का श्राद्ध 8 अक्तूबर को होगा। इस दौरान मंगल कार्यो से बचना चाहिए। उन्होंने बताया कि 3 अक्तूबर को मातृनवमी का सुहागिन औरतों का तर्पण करना उत्तम रहेगा। सन्यासी, गृहस्थों का श्राद्ध द्वादशी केदिन 6 अक्तूबर को करना उत्तम रहेगा। पितृ विसर्जन 8 करना ठीक रहेगा, क्योंकि 9 को भौमवती अमावस्या के दिन स्नान दान की आमवस्या रहेगी। इस वर्ष हस्त नक्षत्र मिलने के संयोग के चलते गया आदि तीर्थो में श्राद्ध तर्पण करने से दान का विशेष फल पितरों को मिलेगा।

मोक्ष के लिए तर्पण...
जीवन के चार पुरुषार्थ हैं। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष। इन चार पुरुषार्थो में मोक्ष प्राप्ति के लिए पितृपक्ष सबसे उत्तम माना गया है। भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक का समय पितृ पर्व के रुप में मनाया जाता है। इसमें हम पितृ स्मरण करते है, जिसे श्राद्ध पर्व भी कहते हैं। इसमें पिंडदान और तर्पण का विधान सर्वोपरि है। कहते हैं तर्पण के जरिए ही पितृ मोक्ष प्राप्त करते हैं। 
‘‘ब्रह्म ज्ञान, गया श्राद्धं 
गौगृह मरणं तथा 
कुसांग वासांग कुरुक्षेत्रे 
मुक्ति रेखा चतुर्थ विद्या‘‘
अर्थात मोक्ष प्राप्ति के लिए ये चार विद्याएं इन पंक्तियों में बताई गयी है, जिनमें गया श्राद्ध गृहस्थ जीवन के लिए सबसे सुलभ मार्ग हैं। इससे हम अपने पितरों को श्राद्ध कर्म के माध्यम से तृप्त करने की कामना करते हैं। इसी निमित्त मानव कालांतर से श्राद्ध कर्म करते हुए अपने पितरों को मुक्ति दिलाने का काम करता आया है। इसीलिए इसे श्रद्धा से करना चाहिए। कहते है पितृपक्ष पूर्वजों का ऋण यानी कर्ज उतारने का समय होता है। पितृपक्ष यानी महालया में कर्मकांड की विधियां और विधान अलग-अलग होते हैं। श्रद्धालु एक दिन, तीन दिन, सात दिन, पंद्रह दिन और सत्रह दिन का कर्मकांड करते हैं। शास्त्रों की मान्यता है कि पितृपक्ष में पूर्वजों को याद कर किया जाने वाला पिंडदान सीधे उनतक पहुंचता है और उन्हें सीधे स्वर्ग तक ले जाता है। माता-पिता और पुरखों की मृत्यु के बाद उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले इसी कर्मकांड को ‘पितृ श्राद्ध‘ कहा जाता है।
श्राद्ध से श्रेयस्कर कुछ नहीं
कहते है पितरों के कृत्यों से दीर्घ आयु, स्वर्ग, यश एवं पुष्टिकर्म (समृद्धि) की प्राप्ति होती है। श्राद्ध से यह लोक प्रतिष्ठित है और इससे योग (मोक्ष) का उदय होता है। श्राद्ध से बढ़कर श्रेयस्कर कुछ नहीं है। यदि कोई श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है तो वह ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र एवं अन्य देवों, ऋषियों, पक्षियों, मानवों, पशुओं, रेंगने वाले जीवों एवं पितरों के समुदाय तथा उन सभी को जो जीव कहे जाते हैं, एवं सम्पूर्ण विश्व को प्रसन्न करता है। यम ने कहा है कि पितृपूजन से आयु, पुत्र, यश, कीर्ति, पुष्टि (समृद्धि), बल, श्री, पशु, सौख्य, धन, धान्य की प्राप्ति होती है। विष्णुधर्मोत्तरपुराण में ऐसा कहा गया है कि प्रपितामह को दिया गया पिण्ड स्वयं वासुदेव घोषित है, पितामह को दिया गया पिण्ड संकर्षण तथा पिता को दिया गया पिण्ड प्रद्युम्न घोषित है और पिण्डकर्ता स्वयं अनिरुद्ध कहलाता है। विष्णु को तीनों पिण्डों में अवस्थित समझना चाहिए। अमावस्या के दिन पितर लोग वायव्य रूप धारण कर अपने पुराने निवास के द्वार पर आते हैं और देखते हैं कि उनके कुल के लोगों के द्वारा श्राद्ध किया जाता है कि नहीं। ऐसा वे सूर्यास्त तक देखते हैं। जब सूर्यास्त हो जाता है, वे भूख एवं प्यास से व्याकुल हो निराश हो जाते हैं, चिन्तित हो जाते हैं, बहुत देर तक दीर्घ श्वास छोड़ते हैं और अन्त में अपने वंशजों को कोसते (उनकी भर्त्सना करते हुए) चले जाते हैं। जो लोग अमावस्या को जल या शाक-भाजी से भी श्राद्ध नहीं करते उनके पितर उन्हें अभिशापित कर चले जाते हैं। 
पिंड से प्रारंभ मानव जीवन
मानव जीवन का आकार पिंड से ही प्रारंभ होता है। मां के गर्भ में हम सूक्ष्म रुप के बाद पिंड रुप में आते हैं। यह पिंड पांच तत्वों से बना होता है। क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर से तैयार यह शरीर भी अंत में पिंड रुप में ही विलीन हो जाता है। इसी पिंड को व्यक्ति शहद, तिल, घी, शक्कर और जौ पांच तत्वों के साथ अपने पितरों को अर्पित करते हैं। मान्यता है कि जो देवताओं का प्रिय होता है, तिल बुरी शक्तियों को दूर करता है। कुश की जड़ में ब्रह्मा जी का वास होता है, उसके मध्य में नारायण और अग्र भाग में शंकर विराजमान रहते हैं। इसलिए पिंडदान में इन पांच तत्वों के साथ कुश का शामिल होना विशेष महत्व रखता हैं। 
पितरों तक पहुंचता है अर्पित पिंड
भाद्र कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या की तिथि तक पिंडदान से संबंधित कर्मकांड गया की पवित्र पिंडवेदियों पर पुरखों के नामित पिंड अर्पित किए जाते हैं, जो उन तक पहुंचने की कामना के साथ किये जाते हैं। पिंड का अर्पण हम ‘स्वथा‘ शब्द के उच्चारण से करते हैं। मान्यता है कि स्वथा अग्नि नारायण की पत्नी है, जो प्रथम रुप में पिंडों को ग्रहण करती हैं। अमावस्या तिथि को सूर्य नारायण के समक्ष देवताओं की एक सभा होती है जिसमें पितरों के देवता वसु, रुद्र और आदित्य उपस्थित होते हैं। स्वथा द्वारा ग्रहण किए गए पिंड को पितरों के देवता को सभा में समर्पित किया जाता हैं। जो भू-लोक में पुत्र द्वारा अर्पित किए गए पिंड उनके पितरों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी लेते हैं।  
अपनों से नहीं रुठते पितृ
कहते हैं कुंडली में ‘पितृदोष‘ आया है वास्तविक रुप से ग्रहों की स्थिति के अनुसार यह बात सच भी होती है। मगर क्या हमनें इसके पीछे छिपे कारण को कभी ढूढ़ा हैं। जवाब में हर किसी के जिह्वा पर ‘ना‘ ही आएगा। वह इसलिए क्योंकि हम अपने बुजुर्गो को जीते जी वह मान नहीं दे पाएं जो उन्हें देना चाहिए था। इसके बावजूद भी वे अपनों से हमेसा प्रेम की इच्छा रखते रहे। हमारे लाख अपमान के बाद भी वे हमसे स्नेह रखते रहे लेकिन हम वैसा नहीं कर पाएं। चूकि वह तो बाद में भी यह स्नेह नहीं छोड़ते हैं लेकिन आपके द्वारा किए गए इस तरह के कर्मो की वजह से कुंडली में इस तरह के योग आते हैं। 
काशी में होता है त्रिपिंडी श्राद्ध
तीनों लोकों में न्यारी यूपी के काशी एवं बिहार के गया में भारत ही नहीं सात समुन्दर पार से लोग अपने-अपने पूर्वजों को ‘श्राद्ध‘ देने के लिए पहुंचते हैं। कहा जाता है कि काशी में प्राण त्यागने वाले हर इन्सान को भगवन शंकर खुद मोक्ष प्रदान करते हैं, मगर जो लोग काशी से बाहर या काशी में अकाल प्राण त्यागते हैं उनके मोक्ष की कामना से काशी के पिशाच मोचन कुण्ड पर त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है। काशी के अति प्राचीन पिशाच मोचन कुण्ड पर होने वाले त्रिपिंडी श्राद्ध की मान्यताएं हैं कि पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है। इसीलिए पितृ पक्ष के दिनों तीर्थ स्थली पिशाच मोचन पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। पितृ पक्ष अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने, उनका स्मरण करने और उनके प्रति श्रद्धा अभिव्यक्ति करने का महापर्व है। इस अवधि में पितृगण अपने परिजनों के समीप विविध रूपों में मंडराते हैं और अपने मोक्ष की कामना करते हैं। परिजनों से संतुष्ट होने पर पूर्वज आशीर्वाद देकर हमें अनिष्ट घटनाओं से बचाते हैं। 
गया तीर्थ सबसे उत्तम
महर्षि व्यास के अनुसार समस्त तीर्थो में गया उत्तम हैं। इसका उल्लेख विष्णु सूत्र और वायु पुराण में भी मिलता है। जहां यह कहा गया है कि फल्गु तीर्थ में तर्पण और गया कि विभिन्न पिंड देवियों पर पिंडदान करने से पितृ तृप्त होते हैं। गया पितृ तीर्थ के साथ-साथ मंगलदायक तीर्थ भी हैं। ‘पितृतीर्थ गयानाम सर्व तीर्थवरं शुभम्। यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव पितामः।।‘ हालांकि न सिर्फ गया, बल्कि किसी भूभाग में नदी या तालाब में हम पितरों का तर्पण कर सकते हैं। पितरों के निमित्त अमावस्या तिथि में श्राद्ध व दान का भी महत्व हैं। 
जीवितों की सेवा ही पितरों की संतुष्टि है
केवल पितरों को श्राद्ध ही श्रद्धापूर्वक न करें बल्कि जीवित तीर्थ माता-पिता और बुजुर्गो की प्यार और आदर के साथ सेवा भी करें। ताकि हमारे बच्चे भी उससे सीख लें और हमें अपने बुढ़ापे में उनकी बेरुखी व अपेक्षा का शिकार न होना पड़े। जब जीवितों की सेवा करेंगे तभी तो हमारे पितर हमेसा से संतुष्ट होंगे। आज के समय में हर किसी के लिए महत्वपूर्ण है कि जीते जी माता-पिता की सेवा करना, उनका सम्मान करना, प्यार व अपनत्व से उनकी देखभाल करना, उन्हें संभालना, इससे बड़ा तीर्थाटन और क्या हो सकता है भला? आप भले ही तमाम तीर्थ कर लो, लेकिन जिसे अपने बड़ों का दिल दुखाया है उसके लिए इन तीर्थो के दर्शन से भी कुछ नहीं सकता और पितृ भी उनसे प्रसंन नहीं होते। यह बात सोचने की है कि जिन लोगों को आप जीते - जी दो रोटी नहीं दे सकते उनके लिए बाद में मात्र दिखावे के लिए कर्मकांड करते हुए खूब खाना बंटवाओगें तो क्या फायदा मिलेगा? जब आपके बुजुर्ग इस दुनिया में ही आपके व्यवहार से प्रसंन न हो सके तो फिर वे मृत्यु पश्चात आपका यह भोज कैसे स्वीकार करेंगे। यह अपने पितरों के लिए हमारे मन की श्रद्धा, प्यार, कृतज्ञता का प्रतीक हैं। उन्होंने हमें जीवन दिया। धरती पर पहला कदम रखना, बोलना और चलना तो उन्होंने ही सिखाया था हमें। हर प्रकार की उन्नति दी। समाज की मुख्यधारा में चलने योग्य बनाया। शायद किसी कवि ने ठीक ही कहा है, ‘तमन्नाओं से भरी इस जिंदगी में-हम सिर्फ भाग रहे हैं‘ कुछ रफ्तार धीमी कर मेरे दोस्त और इस जिंदगी को जियो, खूब जियो मेरे दोस्त।‘ जबकि सच तो यह है कि ये बुजुर्ग हमसे ही आस लगाये हुए होते हैं। यह एहसास तब होता है जब हम बुजुर्ग हो जाते हैं। ऐसे में हम मातृ-पितृ ऋण को भला कैसे भूल सकते हैं? वैसे भी इस ऋण से आज तक कोई उर्त्तीण नहीं हो सका है।
माता-पिता और बुजुर्ग है जीवित तीर्थ
माता-पिता और बुजुर्ग जीवित तीर्थ होते हैं, उनका प्रेमपूर्ण भाव से दर्शन, उनकी सेवा, उनका सम्मान, प्यार व अपनत्व से उनकी देखभाल करना, उन्हें संभालना इससे बड़ा तीर्थाटन और क्या हो सकता है? इस भाव को कितने सुंदर तरीके से इन पंक्तियों में पिरोया गया है-जिन माता-पिता की सेवा की, उन तीरथ स्नान कियो न कियो। माता-पिता के प्रति हमारे शास्त्रकारों ने आदर, प्रेम और अपनत्व बनाये रखने के लिए ही उन्हें मातृ देवो भव, पितृ देवो भव कहा ताकि हम उनमें देवत्व के दर्शन कर सकें और उनकी सेवा कर स्वयं को धन्य व कृतज्ञ बना सकें। श्रवण कुमार की कथा इस सेवा भाव का आदर्श है। संतति के इसी कृतज्ञ भाव को बनाये रखने के लिए पितृ पक्ष की अवधारणा आयी। वायु, विष्णु और बराह पुराण आदि में अपने पूर्वजों के प्रति इसी कृतज्ञता को व्यक्त करने के लिए पितृ पक्ष में श्राद्ध कर्म का विवरण आता है।
कर्मो पर होता है पुर्नजन्म
ब्रह्मपुराण के अनुसार श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने वाला मनुष्य अपने पितरों के अलावा ब्रह्म, रुद्र, आश्विनी कुमार, सूर्य, अग्नि, वायु, विश्वेदेव एवं मनुष्यगण को भी प्रसन्न करता है। आत्मा की अमरता का सिद्धांत तो स्वयं भगवान श्री कृष्ण गीता में उपदेशित करते हैं। आत्मा जब तक परमात्मा से संयोग नहीं कर लेती, तब तक विभिन्ना योनियों में भटकती रहती है और इस दौरान उसे श्राद्ध कर्म में संतुष्टि मिलती है। यही कारण है कि पितरों का श्राद्ध करने का महत्व है। शास्त्रों के अनुसार मनुष्य अपने कर्म के अनुसार विभिन्न प्रकार के फलों का भोग करता है। इन्हीं कर्मों के अनुसार उसे मृत्यु के पश्चात कोई योनि प्राप्त होती है। कर्मफलों के अनुसार ही उसे स्वर्ग, नरक एवं पुनर्जन्म की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में वर्णित है कि श्राद्धकर्ता के तीन पीढ़ियों तक के पितरों को शीत, तपन, भूख एवं प्यास का अनुभव होता है पर स्वयं कर्म न कर सकने के कारण वे अपनी भूख-प्यास मिटा सकने में असमर्थ होते हैं। इसी कारण सृष्टि के आदि से ही श्राद्ध का विधान प्रचलन में है। श्राद्ध इसलिए जरुरी है क्योंकि पिता के जिस शुक्राणु के साथ जीव माता के गर्भ में जाता है, उसमें 84 अंश होते हैं। इनमें से 28 अंश तो पुरुष के स्वयं के भोजनादि से उपार्जित होते हैं और 56 अंश पूर्वजों के होते हैं। इन 56 अंशों का बंटवारा इस तरह होता है कि 21 अंश पिता के, 15 अंश पितामह के, 10 अंश प्रपितामह के, 6 अंश चतुर्थ पुरुष के, 3 पंचम पुरुष के और एक षष्ठ पुरुष के होते हैं। इस तरह सात पीढ़ियों तक वंश के सभी पूर्वजों के रक्त की एकता रहती है। अतः पिंडदान मुख्यतः तीन पीढ़ियों तक के पितरों को ही दिया जाता है। क्योंकि ऊपर वाले पितरों से जीव को दस से कम अंश मिलते हैं। हमारे भीतर प्रवाहित रक्त में हमारे पितरों के अंश हैं, जिसके कारण हम उनके ऋणी होते हैं। यह ऋण उतारने के लिए श्राद्ध करना जरूरी है।
कौओं को भोजन कराना फलदायी
श्राद्ध दिवस को ब्राह्मण भोज से पहले पूर्वजों के हिस्से का भोजन कौआ को कराना फलदायी माना जाता है। लेकिन अगर कौआ नहीं दिखे तो गाय को पूर्वजों के हिस्से का भोजन दिया सकता हैं। बता दें, श्राद्ध के दिन तर्पण के बाद पूर्वजों के भाग का भोज कौआ, मछली, गाय, कन्या, कुत्ता और मांगने वाले को दे सकते हैं। लेकिन इसमें कौआ और गाय का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष में कौवे दिवंगत परिजनों के हिस्से का खाना खाते हैं, तो पितरों को शांति मिलती है और उनकी तृप्ति होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि कौवा एक मात्र ऐसा पक्षी है जो पितृ-दूत कहलाता है। यदि दिवंगत परिजनों के लिए बनाए गए भोजन को यह पक्षी चख ले, तो पितृ तृप्त हो जाते हैं। कौवा सूरज निकलते ही घर की मुंडेर पर बैठकर यदि वह कांव- कांव की आवाज निकाल दे, तो घर शुद्ध हो जाता है। यदि श्राद्ध के सोलह दिनों में यह घर की छत का मेहमान बन जाए, तो इसे पितरों का प्रतीक और दिवंगत अतिथि स्वरुप माना गया है।

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